राजनैतिक क्षेत्र में सिंधीयों को शक्तिशाली बनाने के निम्न लिखित विकल्प,भारत के सिंधी भाषी नागरिकों के सम्मुख विचाराधीन हैं।
विकल्प संख्या 1:-
विधानसभाओं और संसद में अधिक से अधिक सिंधी राजनीतिज्ञों को भेजकर,राजनैतिक क्षेत्र में सिंधीयों को प्रभावशाली बनाया जाय।
इस समय,कुल सिंधी राजनीतिज्ञों में से लगभग 75 प्रतिशत,भारतीय जनता पार्टी,लगभग 15 प्रतिशत कांग्रेस पार्टी,लगभग 2 प्रतिशत कम्यूनिस्ट पार्टी और लगभग 8 प्रतिशत प्रांतीय पार्टीयों(उदाहरणतः उतर प्रदेश में समाजवादी,ब.स.पा.आदि,बिहार में र.जे.डी.,जे.डी.यू.आदि,महाराष्टृ में शिवसेना,एन.सी.पी.आदि)में प्राईमरीमेम्बर हैं, परन्तु इनमें से लगभग 2 प्रतिशत को ही विधानसभाओं और संसद के चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिल पाता है। 98 प्रतिशत सिंधी राजनीतिज्ञ या तो नामित किए जाते हैं,या स्थानीय निकायों के सदस्य(कारपोरेटर) बन जाते हैं या अपनी अपनी पार्टी की चुनावरैलीयों में दरियां बिछवाने-उठवाने,बिजली पानी,लाऊडस्पीकर आदि की व्यवस्था करने,माला पहनाने का काम करते हैं।कतिपय सिंधी चुनाव चंदे की मोटी रकम देकर पार्टीयों के दिग्गज नेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर,दूसरे सिंधीयों को नीचा दिखाने में ही प्रसन्न रहते हैं।कई धनवान सिंधी राजनैतिज्ञ आये दिन विशाल दावतें करके नेताओं के साथ अपने परिवार तथा प्रतिशिष्ठ सिंधीयों सहित फोटो खिंचवाकर,लोकल अखबारों में छपवाकर सिंधी समाज में निजी इज़त वृद्धी में व्यस्त रहते हैं। टिकट न मिल पाने का कारण यह नहीं है कि उनकी योग्यता और कर्मठता में कोई कमी है।परंतु सिंधीयों के बिखरे हुए पुनर्वास के कारण 99 प्रतिशत चुनाव क्षेत्रों में सिंधी वोट बैंक,अन्य जातियों की अपेक्षा नगण्य सा होता है।अतःउनके जीतने की सम्भावना कम होती है। जातिवाद का अभी भी,राजनैतिक क्षेत्र में बोलबाला है।
विधानसभाओं और संसद का चुनाव जीत जाने के बाद भी,सिंधी सदस्य, सिंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने को बाध्य नहीं समझते,क्योंकि मतदाताओं का बहुमत ग़ैर सिंधीयों का होता है।उदाहरणतः श्री एल. के.आडवाणी,सूचना प्रसारण मंत्री,गृह मंत्री,उप प्रधानमंत्री तथा शैडो प्रधान मंत्री हो जाने के बावजूद सिंधीयों के लिऐ वे कुछ न कर पाये। वे स्पष्ट कहते थे कि उन्हें सिंधीयों ने नहीं जिताया है-वेसिंधीयोंके प्रतिनिधि नहीं हैं।
सिंधी जनता ही एक मात्र वर्ग है,जिसके राष्टृीय नेता तो अनेक हैं परंतु चुना हुआ इलेक्टेड) प्रतिनिधि एक भी नहीं है।
स्पष्ट है कि यह विकल्प प्रभावशाली नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सिंधीयों का चुनाव जीतना व्यर्थ है। कम से कम,राजनीति का व्यवहारिक अनुभव तो मिल ही जाता है।
विकल्प संख्या 2:-
भारत के सिंधी भाषी नागरिकों को राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में एन.सी.एम.एक्ट 1992 के अंतर्गत आरक्षण दिलवाकर उन्हें शक्तिशाली बनाया जाय ताकि वे अन्य भाषा भाषीयों वाला राजनैतिक व सामाजिक सम्मानजनक स्तर प्राप्त करने के लिए सक्षम बन सकें।
यह विकल्प राष्टृीय सिंधी अधिकार मंच द्वारा प्रतिपादित किया जा रहा है। इसका समर्थन सिंधी वेलफेयर सोसाइटी लखनऊ, सिंधी काऊंसिल तथा कतिपय अन्य संस्थायें कर रही हैं।
दूरदर्शन में अन्य भाषाओं की भांति सिंधी भाषा को भी 24 घंटे सात दिन वाला चैनिल दिलाने की भांति,इस विकल्प की प्राप्ति भी हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के अनकूल निर्णय पर निर्भर है।दोनों मामलों में विश्व विख्यात सिंधी बैरिस्टर दादा राम जेठमलाणी का समर्थन प्राप्त है। सभी सिंधी चाहते हैं कि सफलता मिल जाय।
विकल्प संख्या 3:-
भारत में सिंधी भाषी प्रांत,सिंधी प्रदेश का सृजन
सिंधी प्रदेश की स्थापना,प्रकृति जनित सिंधी भाषायी क्षेत्र(सिंधी लिंगुइस्टक टेरीटरी) -एस. एल.टी. में होनी है।वास्तविक(डी.फैक्टो) मान्यता,हिंदुस्तान भाषायी सर्वेक्षण तथा देश- विदेश के विख्यात भाषाविदों से मिल चुकी है।इसमें,कच्छ,बाड़मेर,जैसलमेर,जालोर के चार ज़िले तथा बालोतरा से भुज के बीच कतिपय छोटे नगर हैं।विधिक(डी.ज्योर) मान्यता हेतु, मांगपत्र मार्च2014तथा अनुस्मारक जून 2015 में भेजे जा चुके हैं।
यह क्षेत्र,विभाजन के समय,राजा-महाराजाओं द्वारा शासित था,जिन्हें विकल्प दिया गया था कि वे भारत अथवा पाकिस्तान किसी में भी शामिल हो सकते हैं।चूंकि भाषायी सर्वेक्षण में दर्शाये सिंधी भाषी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सिंध प्रांत तथा मुलतान आदि पाकिस्तान में थे,अतः भारतीय भाग( प्रस्तावित सिंधी प्रदेश) को नज़दीक के प्रांतों गुजरात और राजस्थान के प्रशासकीय आधिपत्य में शामिल कर दिया गया था।
सिंधी प्रदेश हेतु आंदोलन,किसी न किसी रूप में विगत लगभग 40 बरसों से चलाया जा रहा है।परंतु 11 अप्रैल 2016 को सिंधी इण्डियन नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी- सिंद पार्टी की स्थापना से इस आंदोलन में गति आ गई है और समर्थन में उतरोतर वृद्धि हो रही है।
इस विकल्प के कतिपय प्रत्यक्ष लाभ उदाहरण हेतु प्रस्तुत हैः-
1-आरक्षण का लाभः-सिंधी भाषी नागरिकों को आरक्षण के लाभ स्वतःही प्राप्त होने लगेंगे। क्योंकि,अन्य प्रांतों की भांति यहां भी स्थानीय भाषा सिंधी,राजकीय सेवांओं एवं तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश आदि के लिए अनिवार्य रहेगी।
2-दूरदर्शन सिंधी चैनिल-24 घंटे 7 दिनः-सिंधी प्रदेश के गठन से भूमि विहीन भाषा का कलंक स्वतःही मिट जायेगा।इस एक मात्र बाधा के हटने से हमारी कई वर्षों से लम्बित मांग निःसंदेह स्वीकृत हो जायेगी। परिणामस्वरूप,सिंधी भाषा एवं संस्कृति को पुनर्जीवन मिलेगा।
3-मीडिया का अधिक कवरेजः-वर्तमान में राष्टृीय मीडिया सिंधीयों का लेशमात्र भी संज्ञान नहीं ले रहा है- मानों,सिंधी इस राष्टृ के नागरिक हैं ही नहीं। मीडिया या तो उन की उपेक्षा करता है या सिंधीयों को बदनाम करने वाली मामूली घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर दिखाता है प्रदेश का सृजन राष्टृीय मीडिया की नकरात्मक प्रवृति को सकरात्मक बनायेगा।
4-हाशियेकरण-मार्जीनलाईज़ेशन का अंतः-सिंधी प्रदेश से चुने जाने वाले संसद आदि के सदस्यों के मतदाता भी सिंधी होंगे अतः चुने गए प्रतिनिधि सिंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने को बाध्य समझेंगे। निःसंदेह इससे राष्टृीय राजनीति में हमारी भूमिका सशक्त हो जायेगी।
5-गणतंत्र दिवस पर,राष्ट्रीय राजधानी में निकलने वाली परेड में सिंधी प्रदेश की झांकी से हमारे सम्मान का स्तर अन्य भारतीय भाषायी जातियों के समकक्ष हो जायेगा।
6-भारत सरकार द्वारा वितरित विभिन्न पदमा पदकों में प्रांतीयसरकारों की संस्तुतियां भी अनिवार्यहैं। इससे पदकों वाले सिंधीयों की संख्या में बढ़ोतरी निश्चितहै।
7-सिंधी प्रदेश सरकार के विकास कार्यों से प्रेरित होकर,दुनियां भर के ख़रबपति सिंधी,यहां प्रचुर मात्रा में पूंजी निवेश करेंगे।रोज़गार अवसरों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होगी।
8-कोरी क्रीक में सिंधी तीरथ धाम योजना तथा बन्नी क्षेत्र में आर्थिक,शैक्षिक तथा सांस्कृतिक योजनाओं में गति आयेगी।
तीनों विकल्प सिंधी जनता की दरबार में आम सहमति हेतु पेश कर रहा हूं।
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