वर्तमान भारत सरकार की विकेंद्रीकरण नीति के कारण शासन तंत्र में भाषायी इकाईयों की भागीदारी में अप्रतियाशित वृध्दि स्वाभाविक है ।इसी परिपेक्ष्य में भारत की सिंधी भाषी जनता की यथोचित भूमिका के लिए,पर्याप्त सशक्तिकरण आवश्यक है ।
125 करोड़ कुल भारतीयों में 125 लाख कुल सिंधीयों की संख्या इतनी भी कम नहीं है कि उसकी पूर्ण उपेक्षा कर दी जाय।अन्य अनेक भाषायी जातियों की संख्या केवल हज़ारों में है।परन्तु उनके पास अपना स्टेट है,नाम है,सम्मान है,सशक्त अस्तित्व है।जबकि,सवा सौ लाख सिंधीयों का कहीं भी नाम नहीं है।न दूरदर्शन में,न राष्ट्रीय अख़बारों में,न दैनिक राष्ट्रीय जीवन में। सबसे अधिक लोकप्रिय साधन है-दूरदर्शन-टी.वी.,जिसे सभी 125 करोड़ लोग,दिन के किसी न किसी समय में देखते हैं।यदाकदा सिंधी नाम वाले राष्ट्र नेताओं की चंद सेकंड की झलक को छोड़कर,पूरे 365 दिन,पंजाबी,गुजराती और अन्य ग़ैर सिंधी दिखाये जाते हैं।ऐसा लगता है कि सिंधी,भारत के नागरिक न होकर,भारत में मात्र व्यापार करने वाले विदेशी हों।
हम सिंधी तरसते हैं कि टी.वी. में कोई सिंधी दिखे,जो सिंधी कौम की अच्छी तस्वीर,भारत की जनता तक पहुंचाये।परन्तु दिखते हैं----व्यभिचार के आरोपी आसाराम और उनके पुत्र नारायण सामी।प्रसिध्द सिंधी भी तब दिखते हैं,जब किसी मामले विशेष में उनकी छीछालेदर हो चुकी हो।उदाहरणतःसुप्रिसिध्द फिल्म प्रोड्यूसर पहिलाज निहालानी,जिनकी उड़ता पंजाब के सेंसर में हुई फजीहत को नमक मिर्च लगाकर टी.वी. में दर्शाया गया।
सिंधी कौम की बदनाम छवि के प्रचार से सहमकर,कई सिंधीयों ने सिंधी पहचान वाले नाम बदल दिए हैं और रहन सहन के स्थानीय तौर तरीके अपनाकर,स्थानीय लोगों को बेटियां ब्याह कर,सिंधी कौम की आत्म हत्या में योगदान किया है। परिणामतः अन्य भाषा भाषीयों की जनसंख्या तो उतरोतर बढ़ रही है,जबकि सिंधीयों की जनसंख्या घटती जा रही है|
भारत की प्राचीनतम सिंधी सभ्यता,अपने को जीवित रखने के लिए छटपटा रही है।
भारतीय सिंधी जनता की इस दुर्दशा से सभी सिंधी चिंतक चिंतित हैं।क्योंकि केवल चिंतक और बुध्दजीवी ही कौम के भविष्य के बारे में चिंता करते हैं। शेष सभी तो केवल अपने व्यक्तिगत लाभ व ऐशोआराम की सोच में व्यस्त रहते हैं।
सिंधी कौम के भविष्य की चिंता करने वाले आधे प्रतिशत से भी कम इन बुध्दजीवियों में भी यदि आम सहमति न बन सके, तो सोचिये,उस कौम का भविष्य क्या होगा। ग़नीमत है,असहमति का कारण वैचारिक नहीं है।व्यक्तिगत अभिमान(ईगो)के कारण ये बुध्दजीवी एक स्थान पर बैठ कर,खुला विचार विमर्श कर ही नहीं पाये हैं।घोर संकट के कारण,अब उन्हें,बिना किसी अभिमान व पूर्वाग्रह के खुले विचार विमर्श से यह तय करना है कि भारत की सिंधी भाषी जनता को किस प्रकार से सशक्त बनाया जाय।
विगत सत्तर वर्षों में,सिंधी जनता अपनी भाषा,संस्कृति एवं जड़ों के प्रति पूर्णतया उदासीन रही है।इसका प्रमुख कारण था,स्वंय को स्थापित करने में घोर व्यस्ता।परिणामतः आर्थिक क्षेत्र को छोड़कर,अन्य सभी क्षेत्रों में सिंधी जनता,शेष चौदह प्रमुख भाषायी जातियों से अत्यधिक पिछड़ गई है।
अब समय आ गया है,सिंधीयों को एक जुट होकर,खोया हुआ बराबरी का दर्जा(स्टैटस)राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों,विशेषतःराजनैतिक क्षेत्र में फिर से प्राप्त करना होगा|
सिंधी जाति की वर्तमान हाशिये पर पहुंची हुई दुर्दशा तभी समाप्त हो पायेगी। कतिपय बुध्दजीवियों का अभिमत है कि उपरोक्त बराबरी का दर्जा प्राप्त करने के लिए भारत की सिंधी जनता को विशेष आरक्षण प्राप्त होना चाहिए।
सिंधी एक जुटता हेतु इस पर असहमति उचित नहीं है।
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