Friday, January 20, 2017

सिंधी अिधकार मंच पर व्याख्या


वाट्सऐप पर सिंधी अधिकार मंच के गठन तथा भोपाल में सिंधी विद्वानों की तद्विषयक गोष्ठी का समाचार पढ़ा।यद्यपि,भोपाल गोष्ठी की कार्यवाही रिपोर्ट उपल्बध नहीं हो पाई,तथापि संयोजक,राष्टृीय सिंधी अधिकार मंच की दिनांक 3-8-2016 की रिपोर्ट में उदेश्यों तथा भविष्य की कार्यवाही का पर्याप्त आभास मिला। रिपोर्ट के गहन अध्ययन से ज्ञात हुआ कि मंच की उच्चतम प्राथमिकता भारत में सिंधी भाषी प्रांत की स्थापना ही है।परंतु,यदि यह सम्भव न हो तो भारतीय सिंधी समाज के समस्त मौलिक अधिकारों की प्रापिती और सभी संवैधानिक पदों पर आसीनता हेतु सिंधीयों को सक्षम बनाने के लिए उन्हें अल्पसंख्यक घोषित कर दिया जाय।


सिंधी भाषायी प्रांत की स्थापना पर संशय का प्रमुख कारण उनका यह भ्रम है कि 1956 के प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा सिंध प्रांत की मांग को अस्वीकृत किया गया था| सिंधी अधिकार मंच के सम्मानित विद्वानों को मैं विश्वास दिलाता हूं कि 1956 के आयोग के सम्मुख सिंधी भाषी राज्य की मांग रखी ही नहीं गई थी,क्योंकि उस समय तक सिंध से विस्थापित सिंधी अपने को आथिर्क रूप से पूर्णतया स्थापित करने में उळझे हुए थे। चंद सिंधी विचारकों के लेख 78-80 में सिंधी प्रेस में प्रकाशित होने के बाद लोगों का ध्यान इस ओर गया।अतः 1956 में आयोग के सम्मुख विचार हेतु प्रस्ताव के जाने व अस्वीकृति की ख़बर सही नहीं है।

मैं उन सभी सिंधी संस्थाओं का समर्थक हूं जो सिंधीयों को स्थानीय लोगों में विलीन होने का विरोध करते हैं तथा सिंधीयों की पहचान व अधिकारों के प्रति सजग हैं।

सिंधी अधिकार मंच के विद्वानों के निम्न विचारों का मैं समर्थन करता हू:-

1-सिंधी युवकों को आई.ए.एस.,आई.पी.एस.,आई.एफ.एस.की प्रतियोगिता के लिए तैयार करने के उद्देश्य से उन्हें सिंधी साहित्य का ज्ञान कराना।

2-शिड्यूल कास्ट सिंधीयों को आरक्षण दिलाने का समर्थन करता हूं। परंतु आरक्षण के लिए हिंदू धर्म के स्थान पर विशेष सिंधी धर्म की मान्यता का विरोध करता हूं। जिस हिंदु धर्म को बचाने के लिए अपनी मातृभूमि सिंधु को छोड़ना पड़ा,उसी हिंदु धर्म की विकृति उचित नहीं।

3-बेरोज़गार सिंधीयों को सरकारी नौकरियां और एम.बी.ए. आदि में प्रवेश दिलाने का सबसे आसान तरीका है उन्हें सिंधी शिक्षा का काम चलाऊ ज्ञान कराना।आई.ए.एस. आदि के लिए चलाए जाने वाली कक्षाओं के साथ साथ,सप्ताह में एक दिन अथवा दिन में किसी अतिरिक्त शिफ्ट में,इन बेरोज़गार सिंधीयों की सिंधी शिक्षा पर विचार किया जा सकता है| अन्य प्रांतों की भांति,सिंधी प्रदेश में भी सिंधी भाषा जानने वालों को स्वंयमेव अारक्षण मिल जायेगा।

4-भारतीय सिंधीयों को भाषाई अल्पसंख्यक की मान्यता मिली हुई है।इसके अंतर्गत सिंधी बच्चों को सिंधी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला हुआ है। परन्तु,उनके अभिभावकों को इस अधिकार का उपयोग करने में कोई रूचि नहीं है,अन्यथा सिंधीयों को ऊपर बताई गई विधि से स्वंयमेव आरक्षण का लाभ मिल जाता।राजनैतिक अल्पसंख्यक की मांग अदूरदर्शता पूर्ण है।इसके मिल जाने से,सिंधी प्रांत की मांग पर कुठाराघात होगा

5-मेरा सुझाव है कि हमें भारत की सिंधी जनता का मत जान लेना चाहिए कि वह सिंधीप्रदेश चाहती है अथवा राजनैतिक अल्पसंख्यक का दर्जा।बहुमत,दोनों में से किस पर एकमत है । सिंधी एकता सरवोपर है।एकता के अभाव में विगत 70 साल में हमें सरकार से उपेक्षा के अलावा कुछ भी नहीं मिला।

6-अब तक सिंधी एकता में सबसे बड़ी बाधा महित्वकांक्षी लोगों की प्रतिस्पर्धता के कारण आपसी टकराव तथा गुटबंदी रहा है।इसकी वजह से वे सिंधी समाज के हितों को भूल कर मंज़िल से भटक जाते हैं।सिंधी जनता को जागरूक होकर,ऐसे तत्वों पर हाबी होना पड़ेगा और उन्हें सही रास्ते पर लाना होगा।

7-राष्टृीय स्तर की सिंधी मंज़िल को हासिल करने के साथ साथ प्रांतो की स्थानीय सिंधी समस्याओं हेतु सिंधी एकता के लिए आवश्यक मार्गदर्शन करना होगा।

भारत की सिंधी भाषी जनता का सशक्तिकरण

वर्तमान भारत सरकार की विकेंद्रीकरण नीति के कारण शासन तंत्र में भाषायी इकाईयों की भागीदारी में अप्रतियाशित वृध्दि स्वाभाविक है ।इसी परिपेक्ष्य में भारत की सिंधी भाषी जनता की यथोचित भूमिका के लिए,पर्याप्त सशक्तिकरण आवश्यक है ।

125 करोड़ कुल भारतीयों में 125 लाख कुल सिंधीयों की संख्या इतनी भी कम नहीं है कि उसकी पूर्ण उपेक्षा कर दी जाय।अन्य अनेक भाषायी जातियों की संख्या केवल हज़ारों में है।परन्तु उनके पास अपना स्टेट है,नाम है,सम्मान है,सशक्त अस्तित्व है।जबकि,सवा सौ लाख सिंधीयों का कहीं भी नाम नहीं है।न दूरदर्शन में,न राष्ट्रीय अख़बारों में,न दैनिक राष्ट्रीय जीवन में। सबसे अधिक लोकप्रिय साधन है-दूरदर्शन-टी.वी.,जिसे सभी 125 करोड़ लोग,दिन के किसी न किसी समय में देखते हैं।यदाकदा सिंधी नाम वाले राष्ट्र नेताओं की चंद सेकंड की झलक को छोड़कर,पूरे 365 दिन,पंजाबी,गुजराती और अन्य ग़ैर सिंधी दिखाये जाते हैं।ऐसा लगता है कि सिंधी,भारत के नागरिक न होकर,भारत में मात्र व्यापार करने वाले विदेशी हों।

हम सिंधी तरसते हैं कि टी.वी. में कोई सिंधी दिखे,जो सिंधी कौम की अच्छी तस्वीर,भारत की जनता तक पहुंचाये।परन्तु दिखते हैं----व्यभिचार के आरोपी आसाराम और उनके पुत्र नारायण सामी।प्रसिध्द सिंधी भी तब दिखते हैं,जब किसी मामले विशेष में उनकी छीछालेदर हो चुकी हो।उदाहरणतःसुप्रिसिध्द फिल्म प्रोड्यूसर पहिलाज निहालानी,जिनकी उड़ता पंजाब के सेंसर में हुई फजीहत को नमक मिर्च लगाकर टी.वी. में दर्शाया गया।
सिंधी कौम की बदनाम छवि के प्रचार से सहमकर,कई सिंधीयों ने सिंधी पहचान वाले नाम बदल दिए हैं और रहन सहन के स्थानीय तौर तरीके अपनाकर,स्थानीय लोगों को बेटियां ब्याह कर,सिंधी कौम की आत्म हत्या में योगदान किया है। परिणामतः अन्य भाषा भाषीयों की जनसंख्या तो उतरोतर बढ़ रही है,जबकि सिंधीयों की जनसंख्या घटती जा रही है|

भारत की प्राचीनतम सिंधी सभ्यता,अपने को जीवित रखने के लिए छटपटा रही है।

भारतीय सिंधी जनता की इस दुर्दशा से सभी सिंधी चिंतक चिंतित हैं।क्योंकि केवल चिंतक और बुध्दजीवी ही कौम के भविष्य के बारे में चिंता करते हैं। शेष सभी तो केवल अपने व्यक्तिगत लाभ व ऐशोआराम की सोच में व्यस्त रहते हैं।

सिंधी कौम के भविष्य की चिंता करने वाले आधे प्रतिशत से भी कम इन बुध्दजीवियों में भी यदि आम सहमति न बन सके, तो सोचिये,उस कौम का भविष्य क्या होगा। ग़नीमत है,असहमति का कारण वैचारिक नहीं है।व्यक्तिगत अभिमान(ईगो)के कारण ये बुध्दजीवी एक स्थान पर बैठ कर,खुला विचार विमर्श कर ही नहीं पाये हैं।घोर संकट के कारण,अब उन्हें,बिना किसी अभिमान व पूर्वाग्रह के खुले विचार विमर्श से यह तय करना है कि भारत की सिंधी भाषी जनता को किस प्रकार से सशक्त बनाया जाय।

विगत सत्तर वर्षों में,सिंधी जनता अपनी भाषा,संस्कृति एवं जड़ों के प्रति पूर्णतया उदासीन रही है।इसका प्रमुख कारण था,स्वंय को स्थापित करने में घोर व्यस्ता।परिणामतः आर्थिक क्षेत्र को छोड़कर,अन्य सभी क्षेत्रों में सिंधी जनता,शेष चौदह प्रमुख भाषायी जातियों से अत्यधिक पिछड़ गई है।

अब समय आ गया है,सिंधीयों को एक जुट होकर,खोया हुआ बराबरी का दर्जा(स्टैटस)राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों,विशेषतःराजनैतिक क्षेत्र में फिर से प्राप्त करना होगा|

सिंधी जाति की वर्तमान हाशिये पर पहुंची हुई दुर्दशा तभी समाप्त हो पायेगी। कतिपय बुध्दजीवियों का अभिमत है कि उपरोक्त बराबरी का दर्जा प्राप्त करने के लिए भारत की सिंधी जनता को विशेष आरक्षण प्राप्त होना चाहिए।
सिंधी एक जुटता हेतु इस पर असहमति उचित नहीं है।

राजनैतिक क्षेत्र में भारतीय सिंधीयों को शक्तिशाली बनाने के विकल्प


राजनैतिक क्षेत्र में सिंधीयों को शक्तिशाली बनाने के निम्न लिखित विकल्प,भारत के सिंधी भाषी नागरिकों के सम्मुख विचाराधीन हैं।

विकल्प संख्या 1:- 

विधानसभाओं और संसद में अधिक से अधिक सिंधी राजनीतिज्ञों को भेजकर,राजनैतिक क्षेत्र में सिंधीयों को प्रभावशाली बनाया जाय।
इस समय,कुल सिंधी राजनीतिज्ञों में से लगभग 75 प्रतिशत,भारतीय जनता पार्टी,लगभग 15 प्रतिशत कांग्रेस पार्टी,लगभग 2 प्रतिशत कम्यूनिस्ट पार्टी और लगभग 8 प्रतिशत प्रांतीय पार्टीयों(उदाहरणतः उतर प्रदेश में समाजवादी,ब.स.पा.आदि,बिहार में र.जे.डी.,जे.डी.यू.आदि,महाराष्टृ में शिवसेना,एन.सी.पी.आदि)में प्राईमरीमेम्बर हैं, परन्तु इनमें से लगभग 2 प्रतिशत को ही विधानसभाओं और संसद के चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिल पाता है। 98 प्रतिशत सिंधी राजनीतिज्ञ या तो नामित किए जाते हैं,या स्थानीय निकायों के सदस्य(कारपोरेटर) बन जाते हैं या अपनी अपनी पार्टी की चुनावरैलीयों में दरियां बिछवाने-उठवाने,बिजली पानी,लाऊडस्पीकर आदि की व्यवस्था करने,माला पहनाने का काम करते हैं।कतिपय सिंधी चुनाव चंदे की मोटी रकम देकर पार्टीयों के दिग्गज नेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर,दूसरे सिंधीयों को नीचा दिखाने में ही प्रसन्न रहते हैं।कई धनवान सिंधी राजनैतिज्ञ आये दिन विशाल दावतें करके नेताओं के साथ अपने परिवार तथा प्रतिशिष्ठ सिंधीयों सहित फोटो खिंचवाकर,लोकल अखबारों में छपवाकर सिंधी समाज में निजी इज़त वृद्धी में व्यस्त रहते हैं। टिकट न मिल पाने का कारण यह नहीं है कि उनकी योग्यता और कर्मठता में कोई कमी है।परंतु सिंधीयों के बिखरे हुए पुनर्वास के कारण 99 प्रतिशत चुनाव क्षेत्रों में सिंधी वोट बैंक,अन्य जातियों की अपेक्षा नगण्य सा होता है।अतःउनके जीतने की सम्भावना कम होती है। जातिवाद का अभी भी,राजनैतिक क्षेत्र में बोलबाला है।
विधानसभाओं और संसद का चुनाव जीत जाने के बाद भी,सिंधी सदस्य, सिंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने को बाध्य नहीं समझते,क्योंकि मतदाताओं का बहुमत ग़ैर सिंधीयों का होता है।उदाहरणतः श्री एल. के.आडवाणी,सूचना प्रसारण मंत्री,गृह मंत्री,उप प्रधानमंत्री तथा शैडो प्रधान मंत्री हो जाने के बावजूद सिंधीयों के लिऐ वे कुछ न कर पाये। वे स्पष्ट कहते थे कि उन्हें सिंधीयों ने नहीं जिताया है-वेसिंधीयोंके प्रतिनिधि नहीं हैं।
सिंधी जनता ही एक मात्र वर्ग है,जिसके राष्टृीय नेता तो अनेक हैं परंतु चुना हुआ इलेक्टेड) प्रतिनिधि एक भी नहीं है।
स्पष्ट है कि यह विकल्प प्रभावशाली नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सिंधीयों का चुनाव जीतना व्यर्थ है। कम से कम,राजनीति का व्यवहारिक अनुभव तो मिल ही जाता है।

विकल्प संख्या 2:- 

भारत के सिंधी भाषी नागरिकों को राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में एन.सी.एम.एक्ट 1992 के अंतर्गत आरक्षण दिलवाकर उन्हें शक्तिशाली बनाया जाय ताकि वे अन्य भाषा भाषीयों वाला राजनैतिक व सामाजिक सम्मानजनक स्तर प्राप्त करने के लिए सक्षम बन सकें।
यह विकल्प राष्टृीय सिंधी अधिकार मंच द्वारा प्रतिपादित किया जा रहा है। इसका समर्थन सिंधी वेलफेयर सोसाइटी लखनऊ, सिंधी काऊंसिल तथा कतिपय अन्य संस्थायें कर रही हैं।
दूरदर्शन में अन्य भाषाओं की भांति सिंधी भाषा को भी 24 घंटे सात दिन वाला चैनिल दिलाने की भांति,इस विकल्प की प्राप्ति भी हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के अनकूल निर्णय पर निर्भर है।दोनों मामलों में विश्व विख्यात सिंधी बैरिस्टर दादा राम जेठमलाणी का समर्थन प्राप्त है। सभी सिंधी चाहते हैं कि सफलता मिल जाय।

विकल्प संख्या 3:-

भारत में सिंधी भाषी प्रांत,सिंधी प्रदेश का सृजन

सिंधी प्रदेश की स्थापना,प्रकृति जनित सिंधी भाषायी क्षेत्र(सिंधी लिंगुइस्टक टेरीटरी) -एस. एल.टी. में होनी है।वास्तविक(डी.फैक्टो) मान्यता,हिंदुस्तान भाषायी सर्वेक्षण तथा देश- विदेश के विख्यात भाषाविदों से मिल चुकी है।इसमें,कच्छ,बाड़मेर,जैसलमेर,जालोर के चार ज़िले तथा बालोतरा से भुज के बीच कतिपय छोटे नगर हैं।विधिक(डी.ज्योर) मान्यता हेतु, मांगपत्र मार्च2014तथा अनुस्मारक जून 2015 में भेजे जा चुके हैं।
यह क्षेत्र,विभाजन के समय,राजा-महाराजाओं द्वारा शासित था,जिन्हें विकल्प दिया गया था कि वे भारत अथवा पाकिस्तान किसी में भी शामिल हो सकते हैं।चूंकि भाषायी सर्वेक्षण में दर्शाये सिंधी भाषी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सिंध प्रांत तथा मुलतान आदि पाकिस्तान में थे,अतः भारतीय भाग( प्रस्तावित सिंधी प्रदेश) को नज़दीक के प्रांतों गुजरात और राजस्थान के प्रशासकीय आधिपत्य में शामिल कर दिया गया था।
सिंधी प्रदेश हेतु आंदोलन,किसी न किसी रूप में विगत लगभग 40 बरसों से चलाया जा रहा है।परंतु 11 अप्रैल 2016 को सिंधी इण्डियन नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी- सिंद पार्टी की स्थापना से इस आंदोलन में गति आ गई है और समर्थन में उतरोतर वृद्धि हो रही है।
इस विकल्प के कतिपय प्रत्यक्ष लाभ उदाहरण हेतु प्रस्तुत हैः-
1-आरक्षण का लाभः-सिंधी भाषी नागरिकों को आरक्षण के लाभ स्वतःही प्राप्त होने लगेंगे। क्योंकि,अन्य प्रांतों की भांति यहां भी स्थानीय भाषा सिंधी,राजकीय सेवांओं एवं तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश आदि के लिए अनिवार्य रहेगी।
2-दूरदर्शन सिंधी चैनिल-24 घंटे 7 दिनः-सिंधी प्रदेश के गठन से भूमि विहीन भाषा का कलंक स्वतःही मिट जायेगा।इस एक मात्र बाधा के हटने से हमारी कई वर्षों से लम्बित मांग निःसंदेह स्वीकृत हो जायेगी। परिणामस्वरूप,सिंधी भाषा एवं संस्कृति को पुनर्जीवन मिलेगा।
3-मीडिया का अधिक कवरेजः-वर्तमान में राष्टृीय मीडिया सिंधीयों का लेशमात्र भी संज्ञान नहीं ले रहा है- मानों,सिंधी इस राष्टृ के नागरिक हैं ही नहीं। मीडिया या तो उन की उपेक्षा करता है या सिंधीयों को बदनाम करने वाली मामूली घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर दिखाता है प्रदेश का सृजन राष्टृीय मीडिया की नकरात्मक प्रवृति को सकरात्मक बनायेगा।
4-हाशियेकरण-मार्जीनलाईज़ेशन का अंतः-सिंधी प्रदेश से चुने जाने वाले संसद आदि के सदस्यों के मतदाता भी सिंधी होंगे अतः चुने गए प्रतिनिधि सिंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने को बाध्य समझेंगे। निःसंदेह इससे राष्टृीय राजनीति में हमारी भूमिका सशक्त हो जायेगी।
5-गणतंत्र दिवस पर,राष्ट्रीय राजधानी में निकलने वाली परेड में सिंधी प्रदेश की झांकी से हमारे सम्मान का स्तर अन्य भारतीय भाषायी जातियों के समकक्ष हो जायेगा।
6-भारत सरकार द्वारा वितरित विभिन्न पदमा पदकों में प्रांतीयसरकारों की संस्तुतियां भी अनिवार्यहैं। इससे पदकों वाले सिंधीयों की संख्या में बढ़ोतरी निश्चितहै।
7-सिंधी प्रदेश सरकार के विकास कार्यों से प्रेरित होकर,दुनियां भर के ख़रबपति सिंधी,यहां प्रचुर मात्रा में पूंजी निवेश करेंगे।रोज़गार अवसरों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होगी।
8-कोरी क्रीक में सिंधी तीरथ धाम योजना तथा बन्नी क्षेत्र में आर्थिक,शैक्षिक तथा सांस्कृतिक योजनाओं में गति आयेगी।
तीनों विकल्प सिंधी जनता की दरबार में आम सहमति हेतु पेश कर रहा हूं।

सिंधी कौम को दीपावली का संदेश


आज दीपावली है।आज ही के दिन राम 14 वर्ष के बाद अपने वतन वापस लौट आए और उनके स्वागत में जनता ने घरों को सजाया तथा दीपों की कतारों से रोशनी करी। 14 अगस्त 1947 को,सिंधी कौम के एक वर्ग को अनिशिचित काल की
जलावतनी और सिंधु माता को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई।दीपावली का दिन हमें प्रेरणा देता है कि हम अपनी सिंधु माता को रिहा करवा कर अपनी जलावतनी समाप्त करवाएंl दीपावली के दिन,बीते हुए वर्ष के लेखे जोखे का परीक्षण करके,नए बहीखाते खोलने की परम्परा है।इसको सिंधी कौम पर लागू करते हुए,आइये देखें,विगत वर्ष में,सिंधी
कौम के खोए हुए गौरव को वापस लानें में,कौनसे प्रयतन किए गए और आगामी वर्ष कौनसे कदम उठाये जायेंगे।



सिंधी कौम के पतन का मुख्य कारण था,उस पर ज़बरदस्ती दो कौम का सिध्दांत लादना।ब्रिटिश हुकूमत की शह पर साम्प्रदायक ताकतों ने कौम के दो वर्गों के बीच नफरती दूरीयां पैदा कर दी थी।
विगत वर्ष में,सोशल मीडिया के माध्यम से,संसार भर के सिंधी कौम के बाशिंदों को परस्पर नज़दीक लाने के सफल प्रयतन किए गए।इसके अतिरिक्त वर्लड सिंधी कांग्रेस,सिंधी ऐसोसिएशन आफ कैनाडा एण्ड नार्थ अमेरिका,जीम-सैद स्टडीज़ बोर्ड तथा विदेशों की अनेकों सिंधी संस्थाओं का योगदान भी सराहनीय रहा।
हिंद और सिंध के सिंधीयों की मैत्री और सिंधी एक कौम के विचार को पुनर्जीवित करने हेतु, सोशल मीडिया तथा साहित्यक,सांस्कृतिक,संत कंवररामजी से जुड़े प्रतिष्ठानों आदि द्वारा प्रभावी कार्य हुआ।साम्प्रदायक तत्वों के कमज़ोर होने से,सिंध में आज़ादी हेतु अधिक जागृति उत्पन्न हुई।सभी सिंधी,आशा भरी निगाहों से मोदी सरकार की ओर देख रहें हैं।सम्भवतः2017 में सफलता मिल जायेगी।

हिंद की सिंधी कौम को शक्तिशाली बनाने के लिए विगत वर्ष,सिंधी इण्डियन नेशनल डेमोक्रेटिक(सिंद)पार्टी की स्थापना की गई। इस वर्ष निर्णायक कदम उठायेंगे।

सिंधी कौम के 9 करोड़ भाई बहनों को दीपावली की शुभ कामनायें।

ज्ञान हेमनाणी

आगामी चुनाव और सिंधी मतदाता


ऐतिहासिक कारणों से,विगत 70 साल के चुनावों में,सिंधी मतदाताओं का बहुमत, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को ही वोट देता रहा है। लगभग 65 वर्षों तक सिंधी जनता की कोई अखिल भारतीय स्तर की सामूहिक मांग नहीं थी।स्थानीय समस्याओं के लिए उम्मीदवार की लोकप्रियता को देखते हुए,गुणावगुण के आधार पर सिंधी मतदाता अपने वोट का प्रयोग किया करता था।अधिकांश सिंधी मतदाता तो अपने व्यापार और दुकानदारी के नुकसान से बचने के लिए अपना वोट डालने जाते ही नहीं थे।

परंतु विगत 5 वर्षों में स्थिति बदल चुकी है। सिंधी जनता में जागरुकता आने से अखिल भारतीय स्तर की निम्न मांगें उभर कर सामने आई हैंः-

1-दूर दर्शन पर 24 घंटे 7 दिन के चैनिल सभी भाषाओं को दिए गए हैं। क्योंकि सभी भाषाओं की अपनी अपनी राज्य सरकारें चैनिल के खर्चे की प्रतिपूर्ती करते हैं।अभी हाल ही में बिना राज्यों वाली उर्दू और संस्कृत भाषाओं को भी 24-7 चैनिल एलाट किए गए हैं। खर्चे की प्रतिपूर्ती भारत सरकार कर रही है, सिंधीयों की इस न्यायोचित मांग की अवहेलना निरंतर जारी है।

2-सिंधीयों को राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में एन.सी.एम.एक्ट के अंतर्गत आरक्षण दिया जाय,ताकि उन्हें सरकारी नौकरीयां आदि मिल पायें।

3-अन्य भाषा भाषीयों की भांति,सिंधीयों को भी सिंधी भाषी प्रांत दिया जाय।यह प्रांत पहले से ही मौजूद है,केवल प्रशासकीय मान्यता भर दी जानी है।

4-अन्य भाषा भाषीयों को मिलने वाले राजनैतिक अधिकार सिंधीयों को भी दिए जायं। सिंधी मतदाताओं से अपील है कि आगामी चुनाओं में जिस राजनैतिक पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र(मैनीफैसटो) में उपरोक्त सिंधी मांगें शामिल हों, केवल उसी पार्टी को सिंधी मतदाता वोट दें। सिंधीयों को पूर्ण विश्वास है कि हमारे लोकप्रिय प्रधान मंत्री माननीय नरेंदर मोदी जी,
भारतीय सिंधीयों की भावनाओं को ध्यान में रखकर,उपरोक्त न्यायोचित मांगों को भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में सम्मिलित कराने की व्यवस्था अवश्य करवायेंगे।

ज्ञान हेमनाणी